गुरुवार, 23 जुलाई 2009
सच का सामना या दर्शकों को टोपी??????????
हम जो कहें वह जवाब दीजिये। उसे हम अपने मुताबिक (दर्शकों के रोमांच का ख्याल रखते हुए) सही या गलत ठहराएंगे।
आप अपने पैसे से मतलब रखिये और हमें भी कमाने दीजिये। हाँ! इसके लिए आपको समाज में थोडी शर्मिंदगी झेलनी पड़ सकती है, परन्तु इतने पैसों के लिए आप इतना बलिदान तो कर ही सकतें हैं।
फिर भारतीय पब्लिक तो अल्प-स्मृति से ग्रस्त है. और हम इसे इतना ग्लेमर प्रदान कर रहें हैं कि भ्रष्टाचार या समलैंगिकता की तरह इसे भी सामाजिक मान्यता मिल जायेगी।
क्या एक सोची -समझी साजिश के तहत भारतीय मूल्यों को तार - तार नहीं किया जा रहा ?
या फिर यह बन्दर के हाथ में उस्तरे वाला मामला है?
रविवार, 8 मार्च 2009
अंग्रेज़ी....... हाय मार डाला .....
" भारतीय शिक्षा पद्धति रास्ते के किनारे पड़ी हुई उस कुतिया के समान है जिसे कोई भी राह चलते दो लात लगा सकता है"- श्रीलाल शुक्ल (रागदरबारी)
"हर पुरूष की सफलता के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है ......... जो उसे असफलता की ओर धकेलने को प्रयासरत रहती है"- सन्दर्भ याद नही।
मित्रों कल दोपहर टी वी चैनल बदलते हुए एक फ़िल्म पर नजर पड़ी। कोई दक्षिण भारतीय फ़िल्म थी जिसे हिन्दी में डब किया गया था । दृश्य यह था कि अंग्रेजी सिखाने की क्लास चल रही है और अध्यापक अंग्रेजी का महत्व समझाते हुए कह रहा है-
" बेटा ! हिन्दी हमारी माँ है जिसकी जरूरत सिर्फ़ पाँच या सात साल के लिए होती है लेकिन अंग्रेजी पत्नी के समान है जिसकी जरूरत जीवन भर पड़ती है।"
होली की शुभकामनाये. बुरा न मानो होली है........
गुरुवार, 5 मार्च 2009
मैं सेकुलर नही हूँ......
चुनाव की फाल्गुनी बयार अब धीरे - धीरे जेठ की तपती लू में बदलने जा रही है और एक बार फिर हिंदुत्व बनाम "सेक्लुरिस्म" का नारा बुलंद हो चुका है। हिंदुत्व को गरियाने का बारामासी राग मंद से सम पर आ गया है और द्रुत की ओर अग्रसर है। इस पोस्ट को लिखने से पहले मैं संजय बेगानी की एक पोस्ट पढ़ रहा था - नेताजी हिन्दू थे तो इसमें बूराई क्या है? और मैंने उसी पर टिप्पणी देने का मन बनाया था परन्तु "सेक्लुरिस्म" बीच में आ गया तो मैंने इसे एक नयी पोस्ट का रूप देने का फैसला किया।
तो आइये हम एक वर्जित विषय पर चर्चा करे - हिन्दुत्व
दरअसल जिसे आज हम हिन्दू धर्म कहते है वह कोई धर्म है ही नहीं. आर्य या वैदिक धर्म का जन्म जिस समय हुआ था उस समय दुनिया में धर्म (पंथ) नाम की कोई चीज थी ही नहीं. समाज के मनीषियों ने समाज और जीवन को निर्बाध और सुचारू ढंग से चलाये रखने के लिए जीवन के कुछ नियम बनाये थे जिनके पीछे उचित तर्क और गहन दर्शन था. "हिन्दू कोई धर्म नहीं वास्तव में एक जीवन दर्शन है". वह जीवन को जीने का एक तरीका है. यही बात सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले में दोहरा चुका है. हिन्दू शब्द अरबवासिओं ने सिन्धु नदी के पूरब की ओर रहने वाले सभी मनुष्यों के लिए एक जातिगत संज्ञा के रूप में प्रयोग किया था। कालांतर में यह वैदिक धर्म को मानने वालों के लिए रूढ़ हो गया परन्तु हिन्दू कोई भी हो सकता है जो इसके जीवन दर्शन को मानता हो , उसका पालन करता हो.
बहस का मुद्दा धर्म नहीं वरन "धर्मनिरपेक्षता" (सेकुलरिस्म) है . पहले ये जानने की आवश्यकता है कि सेकुलर कौन है।
१ यदि ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करना ही धर्मनिरपेक्षता है तो फिर तो पूरी दुनिया ही सांप्रदायिक है (सिवाय चंद अनीश्वरवादिओं, कम्युनिस्टों के)। ऐसे में केवल हिन्दू धर्मावलम्बियों को सांप्रदायिक कहना किस तरह उचित है.
२. यदि किसी धर्म में आस्था रखते हुए भी दूसरे धर्मों की मान्यताओं और विचारों को आदर देना धर्मनिरपेक्षता है तो फिर एक हिन्दू सबसे ज्यादा धर्मनिरपेक्ष होता है क्योंकि हिंदुत्व का मूल ही सर्वधर्म समभाव और सहिष्णुता है।एक हिन्दू को न मंदिर में सर झुकाने से परहेज है ना ही मस्जिद या गिरजे में ( मैं स्वयं को इसी वर्ग में रखता हूँ). परन्तु क्या यही बात दूसरे धर्मों के विषय में भी कही जा सकती है?
३. किसी भी पंथ में न बंधना और अपना एक अलग रास्ता पकड़ना (जैसा कि कम्युनिस्ट करने की सोचते है) भी एक नए पंथ को जन्म देने जैसा ही है। (जैसे शीत- युद्ध के ज़माने में दो ध्रुवीय विश्व को नकार कर गुटनिरपेक्ष आन्दोलन चलाया गया था परन्तु क्या वह एक तीसरा गुट तैयार करने जैसा नहीं था?) फिर "धर्म की निरपेक्षता" रही कहाँ और स्वयं कम्युनिस्ट भी सेकुलर कहाँ रहे ?
मित्रों, यदि आप कोई चौथा विकल्प भी सुझा सकें तो स्वागत है...... लेकिन मैं तो "सेकुलर" नही ही हूँ.
शनिवार, 28 फ़रवरी 2009
स्लमडॉग, क्रिकेट, कश्मीर और गुलाबी चड्ढी..........
अभी कल - परसों ही न्यूज़ चैनलों में ये खबर चलनी शुरू हुई कि इस फिल्म के बाल कलाकारों के लिए इस शोहरत का खुमार उतारने का कार्य किया एक जोरदार झापड़ ने.......... जी हाँ! और ये झापड़ पड़ा दस वर्षीय अजहरुद्दीन मोहम्मद इस्माईल को जो मुंबई की एक झोपड़पट्टी से उठकर रातोरात ऑस्कर जीतने वाली टीम का हिस्सा बन गया लेकिन उसकी गुस्ताखी देखिये - उसने लम्बी हवाई यात्रा में थक जाने के कारण सोने की इच्छा जताई और घर के बाहर भीड़ लगाये मीडिया वालों को इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया. उसके पिता को उसकी ये मासूम शोखी नागवार गुजरी और फिर एक जोरदार झापड़ ने अजहरुद्दीन की नीद का खुमार उतार दिया. इस मसले पर शोरशराबा जारी है और मंगलोर के निवासियों को तालिबानी घोषित कर देने वाली हमारी माननीय केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने इस मामले की जाँच के आदेश दे दिए है. आखिर उन्हें महिलाओं और बच्चों की इतनी फिकर जो है....
अब जरा दूसरी खबर को देखें............
भारतीय कश्मीर (चूँकि अब दस्तावेजों में इसे इसी नाम से जाना जाता है) में अनेको आतंकवादी संगठन सक्रिय है जो विदेशी पैसे और कठमुल्लेपन के जुनून में इस धरती के स्वर्ग को नर्क बना चुके है. इन्ही आतंकवादी संगठनो का एक महिला प्रकोष्ठ है दुख्तराने - मिल्लत (मजहब की बेटियाँ).इस संगठन की प्रमुख हैं असिया अंदराबी. इनके पति शौकत अहमद उर्फ़ कासिम आतंकवादी कमांडर रह चुके हैं और फिलहाल जेल में है. मोहतरमा स्वयं भी जब तब अपने कारनामों के वजह से जेल या नजरबंदी में रहती हैं. इन्हें सभी भारतीय फिल्म अश्लील प्रतीत होती है और ये घाटी में उनके पोस्टरों पर कालिख पोता करती है. इन्हें बगैर बुरखे वाली लड़कियां और स्त्रियाँ चरित्रहीन और अशोभनीय लगती हैं .हिजबुल मुजाहिदीन के साथ 1993 में इन्होने कश्मीर में ये फरमान जारी किया कि सभी लड़कियां और स्त्रियाँ बुरखा पहने वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहें. इनके भाइयों (आतंकवादियों) ने कई स्त्रियों के पैरों पर गोली मार दी जो इनके लिहाज से शालीन और शरीयत की तजवीज के अनुसार पोशाक नहीं पहने थी. इनके कार्यकर्ताओं?? ने बिना बुरखे वाली औरतों के चेहरे पर तेजाब भी फेंक दिया. इन्हें बहुविवाह प्रथा में कोई बुराई नहीं दिखती और इन्ही के शब्दों में - "मुझे अपने घर में मेरे शौहर की अन्य बीवियों के साथ रहने में अत्यंत प्रसन्नता होगी।"
इन्ही मोहतरमा का बेटा जिसका नाम इन्होने रखा है मुहम्मद बिन कासिम (जी हाँ!! सिंध का लुटेरा और भारत का पहला मुस्लिम आक्रमणकारी)। बरखुरदार को क्रिकेट खेलने का शौक और बकौल इनके जूनून है. जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन की अंडर 16 टीम में चुन भी लिए गए लेकिन इनकी माँ ने हुक्म सुनाया- क्रिकेट को चुनो या फिर माँ - बाप को!! मजबूर बालक को माँ - बाप चुनने पड़े. असिया को भय है की कहीं उनका बेटा भारतीय टीम के लिए भी ना चुन लिया जाये क्योंकि भारत विरोध ही तो उनके आन्दोलन की बुनियाद है. उन्हें यह भी डर है कि क्रिकेट में मिलने वाले करोडो रुपयों कि चमक के आगे उनका बेटा कही अपने माँ-बाप की सनक को भूल ना जाए.
सुन रही है रेणुका जी ?? क्या आप मोहतरमा अंदराबी को भी नोटिस भेजेंगी या फिर कश्मीर भारत के कानून के दायरे से बाहर है?? मैं जानता हूँ आप ऐसा नहीं कर पाएँगी। दरअसल माननीय मत्री महोदया को बच्चो और महिलाओं की नहीं बल्कि मीडिया और कैमरों की ज्यादा चिंता रहती है. जहाँ बगैर किसी राजनीतिक खतरे के मुफ्त की पब्लिसिटी मिल जाये वहां मुंह चलाने में क्या हर्ज है? भारत में जाने कितने अजहर यहाँ - वहां अपने माँ- बाप और मालिकों से रोज पिटते रहते है परन्तु मंत्री महोदया को जब "स्लमडॉग" के बहाने फोटो खिचाने का बेहतरीन मौका हाथ लग रहा हो तो फिर गली मोहल्ले में कोई राजू -पप्पू पिटता रहे उनकी बला से।
गुलाबी चड्ढी अभियान की कर्ता-धर्ता जरा बतायेंगी (यदि वे अब भी होश में हैं) क्या वे असिया अंदराबी को भी गुलाबी.......मेरा मतलब है ....... कुछ भेजने की कृपा करेंगी??
शुक्रवार, 9 जनवरी 2009
राष्ट्रवाद और हम भारतीय
1. मेरे एक सम्बन्धी साइबर कैफे चलाते है. उत्तर प्रदेश सरकार ने अब साइबर कैफे में इन्टरनेट का उपयोग करने हेतु पहचान पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया है परन्तु मैं देखता हूँ की परिचय पत्र मांगने पर अधिकांश लोग सहयोग करने के बजाये आनाकानी और हील हुज्जत करते हैं. जबकि ऐसा नागरिकों की सुरक्षा के लिए ही किया गया है. क्या सभी का फर्ज नहीं बनता की वे परिचय पत्र दिखाकर कानून का पालन करें? जबकि यही लोग बम विस्फोट के बाद जिस साइबर कैफे से ईमेल भेजा गया होता है उसके मालिक को हज़ार गलियां सुनाते और उसे देशद्रोही तक कहते है।
2. ट्राफिक और अन्य कायदे - कानूनों का पालन हम भारतीय किस प्रकार करते हैं यह किसी से छुपा नहीं है. कोई भी परिवार, समाज, राष्ट्र बिना कायदे कानूनों के नहीं चल सकता. क्या हम अपने घर में भी उसी प्रकार कचरा फैलाते, पीक थूकते या पेशाब करते फिरते हैं जिस प्रकार हम सार्वजनिक स्थानों पर करते है? यदि नहीं तो फिर किस मुंह से हम इसे अपना देश कहते हैं।
3. जरा - जरा सी बात पर युवा वर्ग तोड़- फोड़ पर उतर आता है और लाखों की सार्वजनिक संपत्ति स्वाहा हो जाती है. क्या यह संपत्ति किसी दूसरे की है? जी नहीं यह हमारे और आपके अदा किये हुए टैक्स से खरीदी गयी है.......हमारी गाढी कमाई है. और फिर इन बेजान वस्तुओं ने आपका क्या नुक्सान किया है. नुक्सान किया है तो किसी अधिकारी, मंत्री या नेता ने. यदि है हिम्मत तो जाईये और उसे उसके घर से खींचकर चौराहे पर चार जूते मारिये. लेकिन नहीं... आप ऐसा नहीं कर पाएंगे क्योंकि उस के चारों तरफ सुरक्षा घेरा है और ऐसे में आपपर जूते पड़ने की संभावना ज्यादा है. तो गुस्सा बेजुबान वस्तुओं पर ही उतरता है. यह है हमारी नपुंसक वीरता और देशभक्ति !!
4. हमारा पडोसी चीन न सिर्फ हमारा प्रतिद्वंदी है बल्कि हम उससे युद्ध भी हार चुके हैं साथ ही वह हमारे विरोधी देश पाकिस्तान का घनिष्ट मित्र भी है. अन्तराष्ट्रीय संधियों और कानूनों के चलते हम चीन के बने सामानों पर पाबन्दी नहीं लगा सकते. भारतीय बाज़ारों में चीन के बने इलेक्ट्रॉनिक सामान, लक्ष्मी- गणेश और अन्य देवी देवता, घरेलू उपयोग की वस्तुए, खाने पीने की वस्तुएं, बच्चों के खिलौने और उनके उपयोग की वस्तुए सब छाये हुए हैं क्योंकि उनकी कीमत भारतीय वस्तुओं से थोडी कम है. जबकि हम सभी जानते हैं की गुणवत्ता के मामले में चीन का बना सामान न सिर्फ घटिया है बल्कि जहरीला और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी है. क्या हम चीनी सामानों को खरीदने से परहेज नहीं कर सकते ? यह हमारे देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा को एक ऐसे देश में जाने से रोकेगा जो हमारा शत्रु देश है. क्या यह राष्ट्रवाद नहीं है ?
ध्यान दीजिये - नेताओं के सुधरने की आशा मत कीजिये क्योंकि सुधरकर उनका कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है, सुधरना हमें और आपको ही होगा।
उठिए, जागिये और सतर्क बनिए, अपने अधिकारों के प्रति भी और अपने कर्तव्यों के प्रति भी, कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाये और हमारे प्रमाद का फल आने वाले पीढियों को भुगतना पड़े. अगर ऐसा हुआ तो इतिहास हमें कभी माफ़ नहीं कर पायेगा....
पुनःश्च : ट्रांस्लितेराटर कि सीमाओं के कारण कुछ वर्तनीगत अशुद्धिओं के लिए क्षमा चाहता हूँ.
गुरुवार, 1 जनवरी 2009
क्या अमेरिका सचमुच भारत के पक्ष में है ????
१ अमेरिका इराक में अपने उद्देश्य में कामयाब हो चुका है (उसने वहां के तेल भंडारों पर कब्जा जमा लिया है और अपने सबसे बड़े दुश्मन सद्दाम को निपटा दिया है)।
२ इरान के परमाणु कार्यक्रम को सबसे ज्यादा मदद पाकिस्तान से मिलने की संभावना है अतः पाकिस्तान के कान उमेठना जरूरी हैं परन्तु अफगानिस्तान की फांस के चलते वह सीधे तौर पर पकिस्तान को नही निपटाना चाहता । इस घटना से उसे भारत के रूप में एक कन्धा मिल गया है अपनी बन्दूक को चलाने के लिए।
३ भारत के रूप में उसे एक ऐसा साझीदार मिल सकता है जो उसे एशिया में चीन के ख़िलाफ़ न सिर्फ़ एक मजबूत आधार प्रदान कर चीन पर दबाव बनने में मदद करेगा बल्कि एक बड़ा बाज़ार भी प्रदान करेगा जिसकी अमेरिका को इस समय बेहद जरूरत है।
४ अमेरिका को अपने नए विकसित हथियारों के लिए एक सजीव युद्ध भूमि चाहिए जहाँ न सिर्फ़ उनकी मारक क्षमता का सही आंकलन हो सके बल्कि उसे उसके संभावित खरीदारों को प्रर्दशित भी किया जा सके । भारत - पकिस्तान के बीच एक सीमित युद्ध से बढ़िया मौका और क्या हो सकता है। इस बहाने पकिस्तान को उसके पैजामे में वापस भेजा जा सकता है।
५ हथियार उद्योग अमेरिका का सबसे बड़ा उद्योग है और तकरीबन सभी अन्य उद्योग उससे किसी न किसी रूप से जुड़े हुए है चाहे अत्याधुनिक हथियार हों, संचार साधन हों, सैनिको के कपडे और अन्य साजो सामान हो या फिर उनके खाने पीने की वस्तुएं । अमेरिका में मंदी और प्रतिगामी विकास दर के चलते भारत - पाकिस्तान के बीच युद्ध इन्हे संजीवनी प्रदान कर सकता है।
इस प्रकार भारत - पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध अमेरिका के कई हित साध सकता है ।
भारत के लिए फायदे की बात यह है कि पाकिस्तान स्वयं भी युद्ध नही चाहता और इसकी संभावना से भयभीत है क्योंकि वह जानता है कि भारत के साथ सीधी लडाई उसके लिए विनाश का कारण होगी क्योंकि न तो उसके पास भारत जितनी ताकत है और ना नैतिक बल। अतः भारत को चाहिए कि वह अपनी मांगो पर डटा रहे और दबाव बनाये रखे साथ ही युद्ध के लिए तैयार रहे और युद्ध होने की स्थिति में आर या पार की लड़ाई लड़े।
शनिवार, 2 फ़रवरी 2008
सय्यद अली शाह गिलानी के मानस पुत्र .......................
अली शाह जिलानी और उसके जैसे तमाम अलगाववादी नेताओं ने बीस साल पहले यही खेल कश्मीर में शुरू किया था और धरती के स्वर्ग को जीता जगता जहन्नुम बना दिया। क्या राज भी वही करने का इरादा रखता है ?

